आधुनिकता में नागपंचमी कि फीकी रौनक़
मायके का प्यार और गुड़िया का त्यौहार भुला बैठी बेटियां

आधुनिकता में नागपंचमी कि फीकी रौनक़
मायके का प्यार और गुड़िया का त्यौहार भुला बैठी बेटियां

प्रतापगढ़(17अगस्त) : सावन के पावन माह का सोमवार और नागपंचमी का दुर्लभ संयोग आस्था और श्रद्धा से सराबोर यह दिन सनातन के लिए बेहद अहम है। आज हर हर बम बम से गूंज उठे शिवालय पर जलाभिषेक से भगवान भोलनाथ की विशेष कृपा की बात महान ग्रंथो से प्राप्त होती है। हालांकि गुड़िया के पर्व को आधुनिकता की नजर लग गई है। याद करें दो दशक में समाज कितना बदल गया है जो त्योहारों का महत्व और लोलुपता को ही निगल गया। दो दशक पहले इस पर्व को मनाने बेटियां मायके जाती थी और वहाँ के झूले पर बैठ कर कजरी गीत गाती थी। मायके का प्यार और दुलार उनके जीवन का अनूठा उदगार मन बसता था। भाइयों के लिए बहनों का अलग अलग मान्यताओं के अनुसार ब्रत और धुधुरी सेवन समेत परम्पराएं दो दशकों में लगभग समापन की ओर चली गई। इतना ही नहीं गाँव गाँव होते पारम्परिक खेल कुड़ी कबड्डी और प्रतिस्पर्धा के तमाम आयोजन अब सब आधुनिकता में लुप्त से हो गए हैं। इन त्योहारों का अपना विशेष सनातनी महत्व है ज़ब वर्ष में फगुवा के बाद पर्व का समापन होता है और नाग पंचमी से पर्व प्रारम्भ होते हैं। फिलहाल आज की आधुनिकता में लोग भले ही भुला दें लेकिन इस पर्व का महत्व आधार से जुडा होने के नाते ख़त्म होने वाला नहीं है। आज नागनागिन की पूजा लावा दूध पुष्प चढ़ाकर कर की जाती है जो सुबह से जगह जगह देखने को मिल रही है और अलग अलग तरह के आयोजन भी जगह जगह पर किए गए हैं जिसे लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह है।


